Monday, October 8, 2007

ग़लत

कही तो ग़लत हु में
कही तो चुक गई हु
जिंदगी की राह में
ज़माने के साथ चलना भूल गई हु

कभी लगता है चलते चलते बदन की ताकत टूट रही है
कभी लगता है रूह की आहट थम गयी है
कितना और तरपावोगे मेरे रब
जीने की चाहत छुट गई है

कितना और प्यार करु में
कितनी मंगू आप से श्रमाँ
रोह रोह के आंशु नहीं थमते
फिर भी पिघलता नहीं आप का जिया

कितना और दुत्कारो गे
कितनी और करोगे हमारी निंदा
माँगा ही क्या है हमने आप से
की रूक रूक के कदम बढ़ाते हो

माना की हम है थोरे से नासमज
जीवन की भुल्भुलिया न समज सके
लेकिन आप तू है ज्ञानी
फिर क्यों न समज सके आप हमारी काहानी

फिर भी हमे नहीं आप से कोई गिला
समज सकते है हम आप की पीडा
आप ने तो दी थी हमें शिक्षा
लेकिन न ले सके हम ही सही दिशा

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